
उत्तराखंड की सियासत में उस समय हलचल तेज हो गई, जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांग्रेस के संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। रावत ने इंटरनेट मीडिया के माध्यम से अपने फैसले की जानकारी साझा की। उनके इस कदम को हाल में उनके पूर्व विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) के घर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी और नकदी बरामदगी से जुड़े विवाद के बाद महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है।
हरीश रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य और दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्य पद से त्यागपत्र देने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व, विशेष रूप से राहुल गांधी, भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में पार्टी के किसी नेता या पदाधिकारी से जुड़ा कोई विवाद इस मुहिम को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
रावत ने कहा कि इसी नैतिक और सैद्धांतिक आधार पर उन्होंने संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को मजबूत बनाए रखना जरूरी है और किसी भी विवाद के कारण राष्ट्रीय नेतृत्व के संघर्ष पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
वहीं, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने हरीश रावत का बचाव करते हुए कहा कि उन्हें ऐसे मामले को लेकर घेरा जा रहा है, जिस पर पूर्व मुख्यमंत्री ने करीब 10 साल पहले ही कठोर कार्रवाई की थी। गोदियाल के बयान के बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस के भीतर भी राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।
हरीश रावत के इस्तीफे को पार्टी के भीतर नैतिक जिम्मेदारी लेने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, उनके इस फैसले ने उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब नजर इस बात पर है कि पार्टी नेतृत्व रावत के इस्तीफे पर क्या रुख अपनाता है और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इसका कांग्रेस की प्रदेश राजनीति पर कितना असर पड़ता है।







