पहाड़ में इलाज की आस टूटी: नवजात के बाद मां ने भी रास्ते में तोड़ा दम

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक के सुदूरवर्ती ओसला गांव में स्वास्थ्य सेवाओं और बदहाल पैदल मार्गों की स्थिति ने एक बार फिर पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार को प्रसव के दौरान नवजात की मौत के बाद गंभीर हालत में अस्पताल ले जाई जा रही 26 वर्षीय प्रसूता अमीना ने रास्ते में दम तोड़ दिया। करीब पांच किलोमीटर का दुर्गम रास्ता तय कर उसे डंडी-कंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा था।

जानकारी के अनुसार अमीना का मायका ओसला गांव में और ससुराल गंगाड़ में है। शुक्रवार सुबह मायके में ही उसका प्रसव हुआ, लेकिन प्रसव के दौरान नवजात की मौत हो गई। इसके बाद अमीना की हालत भी गंभीर हो गई। स्वजन और ग्रामीण उसे डंडी-कंडी के जरिए तालुका और फिर सीएचसी मोरी ले जाने के लिए निकले, लेकिन ओसला से करीब पांच किलोमीटर दूर गंगाड़ के पास उसकी भी मौत हो गई।

ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के कारण क्षेत्र में जगह-जगह भूस्खलन, मलबा और गदेरों के उफान से पैदल रास्ते बेहद खतरनाक हो गए हैं। ऐसे में ओसला समेत आसपास के गांवों से मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में गंभीर मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा है।

अमीना और उसके नवजात की मौत से परिजनों में गहरा सदमा है, जबकि ग्रामीणों में भी आक्रोश है। घटना ने वर्षाकाल में दुर्गम क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं और आपातकालीन परिवहन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सीएचसी मोरी के उप चिकित्साधिकारी डा. रमेश सिंह ने बताया कि दुर्गम क्षेत्रों में वर्षाकाल के दौरान गर्भवती महिलाओं को प्रसव तिथि से करीब 15 दिन पहले नजदीकी चिकित्सालय के आसपास ठहराने की व्यवस्था होती है। उन्होंने कहा कि ओसला की प्रसव पीड़िता की मौत के मामले में किस स्तर पर लापरवाही हुई, इसकी जांच की जाएगी।